विषय: आज के युग में योग की विकृतियाँ — एक चिंतनशील विश्लेषण
(लेखक: कैलाश बाबू योग)
प्रस्तावना
योग भारत की आत्मा है — एक ऐसी जीवंत परंपरा, जो केवल शरीर को लचीला या मन को शांत करने की विधि नहीं, बल्कि जीवन के समग्र उत्थान का मार्ग है। किंतु आज के युग में, जब योग वैश्विक मंच पर लोकप्रिय हो चुका है, तब इसके स्वरूप में अनेक विकृतियाँ उत्पन्न हो गई हैं। योग का मूल उद्देश्य ‘स्व-परिचय’ और ‘मोक्ष की ओर यात्रा’ था, किंतु आज यह अधिकांशतः केवल एक "फिटनेस ट्रेंड" बनकर रह गया है। इस लेख में हम इन विकृतियों की पहचान, कारण और समाधान को समझने का प्रयास करेंगे।
1. योग का व्यवसायीकरण (Commercialization of Yoga)
आज योग एक उद्योग बन गया है। लाखों-करोड़ों का व्यापार, ब्रांडेड मैट, योग-फैशन, कोर्स सर्टिफिकेट — इन सबसे योग एक ‘प्रोडक्ट’ बनकर बिक रहा है।
🌀 विकृति: योग को सेवा के स्थान पर वस्तु बना दिया गया है।
🧭 परिणाम: योग की आत्मा, जो साधना थी, अब ‘क्लास’ बनकर रह गई।
2. केवल शरीर पर केंद्रित योग
प्राचीन ग्रंथ जैसे कि पतंजलि योगसूत्र, हठयोग प्रदीपिका और घेरण्ड संहिता में आसन, प्राणायाम, ध्यान, मौन, ब्रह्मचर्य, तप, सामान्य जीवनशैली को संतुलित रूप में वर्णित किया गया है। किंतु आज योग केवल शरीर को सुंदर और लचीला बनाने तक सीमित हो गया है।
🌀 विकृति: योग को केवल “फिटनेस या वजन घटाने” का साधन बना दिया गया है।
🧭 परिणाम: योग की आध्यात्मिक गहराई नष्ट हो रही है, और लोग सतही लाभ तक ही सीमित रह जाते हैं।
3. सोशल मीडिया योग – ‘दिखावा योग’
इंस्टाग्राम, यूट्यूब, फेसबुक जैसे माध्यमों पर योग का एक अलग ही रूप देखा जा रहा है। कठिन और आकर्षक आसनों की तस्वीरें वायरल होती हैं, परंतु इनका कोई आंतरिक आधार नहीं होता।
🌀 विकृति: योग ‘आत्म-अवलोकन’ से ‘दूसरों को प्रभावित करने का मंच’ बन गया है।
🧭 परिणाम: प्रतियोगिता, अहंकार और नकली साधना पनप रही है।
4. अप्रामाणिक शिक्षकों की बाढ़
आज कोई भी व्यक्ति कुछ सप्ताह के ऑनलाइन कोर्स करके “योग गुरु” बन जाता है। अनुभव और आचार का कोई मापदंड नहीं रह गया। योग अब प्रमाण पत्र का नहीं, आचरण का विषय है।
🌀 विकृति: बिना साधना के उपदेश देना योग का अपमान है।
🧭 परिणाम: विद्यार्थी भटक जाते हैं और योग के वास्तविक स्वरूप से दूर हो जाते हैं।
5. योग को धर्म से जोड़कर संकीर्णता फैलाना
योग सनातन भारतीय संस्कृति से निकला है, पर यह किसी धर्म-जाति या मजहब की सीमा में नहीं बंधा। आज कुछ लोग योग को केवल धार्मिक पहचान से जोड़कर विवाद फैलाने का कार्य कर रहे हैं।
🌀 विकृति: योग का वैश्विक और मानवतावादी स्वरूप संकुचित किया जा रहा है।
🧭 परिणाम: समाज में योग को लेकर भ्रांतियाँ फैलती हैं और इसकी स्वीकृति सीमित होती है।
6. सूक्ष्म और गूढ़ पक्ष की उपेक्षा
बंध, मुद्रा, षट्कर्म, धारणा, ध्यान, समाधि — ये योग के सूक्ष्म पहलू हैं। इनका अभ्यास मार्गदर्शन के बिना कठिन होता है, लेकिन आज की पीढ़ी इन्हें छोड़कर केवल व्यायाम तक सीमित रह गई है।
🌀 विकृति: योग का सूक्ष्म विज्ञान विलुप्त होता जा रहा है।
🧭 परिणाम: व्यक्ति योग का केवल 5% अनुभव करता है, 95% अनदेखा रह जाता है।
समाधान: योग की आत्मा को पुनः पहचानना
✅ योग को पुनः साधना और आत्मिक उन्नति का माध्यम बनाना होगा।
✅ गुरुओं को चाहिए कि वे परंपरा, ग्रंथ और स्वयं के अनुभव के साथ शिक्षण दें।
✅ सोशल मीडिया का उपयोग योग के गूढ़ ज्ञान को फैलाने के लिए हो, न कि दिखावे के लिए।
✅ योग को धर्म से ऊपर, मानवता के हित में प्रस्तुत करें।
✅ योगिक जीवनशैली को अपनाकर स्वयं उदाहरण बनें।
निष्कर्ष
आज आवश्यकता है कि हम योग को बाज़ार, बॉडी और ब्रांड से निकालकर बुद्धि, भक्ति और ब्रह्म की ओर ले जाएँ। यदि हमने इस अमूल्य परंपरा की रक्षा नहीं की, तो आने वाली पीढ़ियाँ योग को सिर्फ एक "फैशन शो" समझेंगी, साधना नहीं।
"योग प्रदर्शन नहीं, आत्मदर्शन है।
योग व्यापार नहीं, तपस्या है।
योग व्यायाम नहीं, समाधि का मार्ग है।"
कैलाश बाबू
#kailashbabuyoga

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